Tuesday, March 3, 2020

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जलवायु परिवर्तन का खाद्य और पोषण पर प्रभाव



प्रस्तावना
  • विश्व की आबादी में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन को देखते हुए दुनिया भर में खाद्य उत्पादकता बढ़ाने की जरूरत है|
  • 2050 तक विश्व की आबादी लगभग 9.5 अरब हो जाएगी, जिसका स्पष्ट मतलब है कि हमें दो अरब अतिरिक्त लोगों के लिए 70 प्रतिशत ज्यादा खाना पैदा करना होगा।
  • इसलिए खाद्य और कृषि प्रणाली को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल और ज्यादा लचीला, उपजाऊ व टिकाऊ बनाने की जरूरत होगी।
  • इसके लिए प्राकृतिक संसाधनों का उचित इस्तेमाल करना होगा और खेती के बाद होने वाले नुकसान में कमी के साथ ही फसल की कटाई, भंडारण, पैकेजिंग और ढुलाई व विपणन की प्रक्रियाओं के साथ ही जरूरी बुनियादी ढांचा सुविधाओं में सुधार करना होगा।
  • खाद्य सुरक्षा से सुरक्षित और पोषक खाद्य पदार्थों की पर्याप्त मात्रा तक पहुंच/उपयोग की क्षमता का पता चलता है; हालांकि संबंधित चुनौतियों से अमीर/गरीब देशों की शहरी/ग्रामीण आबादी समान रूप से प्रभावित हो रही है। एफएओ का अनुमान है कि 2014-16 के दौरान लगभग 19.46 करोड़ भारतीय (15.2 प्रतिशत) को कम भोजन मिला।
जलवायु परिवर्तन-संकट और खाद्य/पोषण असुरक्षा की मुख्य वजह
  • 21वीं शताब्दी के अंत तक वैश्विक तापमान में 1.4-5.8 डिग्री सेंटीग्रेड की बढ़ोत्तरी होने का अनुमान है, जिससे खाद्य उत्पादन में खासी कमी देखने को मिलेगी।
  • इसरो के मुताबिक हिमालय के ग्लेसियर पहले से कम हो रहे हैं (जो 15 साल में लगभग 3.75 किलोमीटर कम हो चुके हैं) और वे 2035 तक गायब हो सकते हैं।
  • यह जलवायु परिवर्तन का प्रभाव है, जिसमें रेगिस्तान का बढ़ना शामिल है और इससे सूखा, चक्रवात, बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं भी सामने आ रही हैं। इनका असर अक्सर सबसे ज्यादा गरीब (अधिकांश किसान) लोगों पर पड़ता है और इस प्रकार 2030 तक भूख को खत्म करने के हमारे लक्ष्य के सामने यह बड़ी चुनौती है!
  • इस प्रकार टिकाऊ विकास के लिए जलवायु परिवर्तन पर केंद्रित कार्ययोजना काफी अहम है। यह विडंबना है कि कृषि को जलवायु परिवर्तन में बड़ा अंशदाता माना जाता है। 2 अक्टूबर, 2016 को भारत ने पेरिस समझौते पर मुहर लगा दी, जिसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन से लड़ना और वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी को 2 डिग्री सेंटीग्रेड से नीचे रखना है।
भारतीय कृषि के संदर्भ में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे
  • ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में वृद्दि जलवायु परिवर्तन की बड़ी वजह है, इसलिए पर्यावरण में सुधार के लिए उनके उत्सर्जन में कमी सुनिश्चित करना जरूरी है।
  • भारतीय कृषि के संदर्भ में जलवायु परिवर्तन के अहम मुद्दों में विभिन्न जलवायु स्थितियों के साथ राष्ट्र की विशालता; विभिन्न फसलें/कृषि प्रणालियां; मानसून पर अत्यधिक निर्भरता; जलवायु परिवर्तन से जल की उपलब्धता प्रभावित होना; छोटे-छोटे खेत; मुंडेर की व्यवस्था में कमी; जोखिम प्रबंधन की रणनीतियों की कमी; बारिश से जुड़े ज्यादा प्रभाव (सूखा/बाढ़, विशेष रूप से तटीय क्षेत्रों में); कीटों/बीमारियों के ज्यादा मामले; ऑक्सीकरण का मिट्टी की उर्वरता पर तेजी से प्रभाव और जैव विविधता का विलुप्त होना शामिल है।
  • भारत अनाज के उत्पादन में आत्म-निर्भर होने में सफल रहा है, लेकिन यह परिवारों की पुरानी खाद्य असुरक्षा का हल निकालने में संभव नहीं हुआ है। उम्मीद है कि जलवायु परिवर्तन से खाद्य असुरक्षा बढ़ेगी, ऐसा विशेष रूप से भूख/कम पोषण वाले क्षेत्रों में देखने को मिलेगा।

भारत पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
  • हमारे देश के लिए जहां अधिकांश आबादी गरीब है और लगभग आधे बच्चे कुपोषित हैं, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना खासा अहम है।
  • जहां खाने की उपलब्धता प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से परिवार/व्यक्तिगत आय से प्रभावित होती है, वहीं खाद्य का इस्तेमाल पेयजल की उपलब्धता में कमी से बिगड़ जाता है और इसका स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ता है।
  • भारत पर वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी की मार पड़ने की संभावना है, जिससे 1.2 अरब लोग प्रभावित हो रहे हैं। ये लोग विशेषकर बाढ़/चक्रवात/सूखा प्रभावित क्षेत्रों के हैं।
  • जलवायु परिवर्तन ‘भूख के जोखिम को कई गुना बढ़ाने’ के लिहाज से अहम है, जिससे खाद्य/पोषण सुरक्षा के सभी अंग प्रभावित हो सकते हैं जिसमें खाद्य की उपलब्धता, पहुंच, इस्तेमाल और स्थायित्व शामिल हैं।
खाद्य/पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पहल
  • खाद्य सुरक्षा को हासिल करना और बरकरार रखना दुनिया भर में बड़ी चुनौतियों में से एक हैं।
  • खाद्य सुरक्षा की योजनाओं में प्राथमिकता के आधार पर समस्याओं को प्रभावी तौर पर दूर करना, खाद्य पदार्थों का पर्याप्त भंडारण/वितरण के साथ ही उपचारात्मक उपायों की निगरानी शामिल है।
  • अपनाए गए उपायों में विशेष रूप से शुष्क/अर्ध शुष्क क्षेत्रों में फसल पैटर्न, नवीन प्रौद्योगिकी और जल संरक्षण अहम हो गया है।
    कार्बन में कमी और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को घटाने की दिशा में आवश्यक प्रयास होने चाहिए। इस संबंध में जागरूकता फैलाने और हर कदम पर जनता की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत है।

भारत में खाद्य/पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पहल
  • भारत में खाद्य/पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा की गई कुछ पहलों में परंपरागत कृषि विकास योजना, प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना, सॉयल हेल्थ कार्ड/सॉयल हेल्थ प्रबंधन योजना, प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना, अन्नपूर्णा स्कीम, मनरेगा, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून, आईसीडीएस और एमडीएमएस आदि शामिल हैं।
  • इन सभी कार्यक्रमों के प्रभावी कार्यान्वयन और विशेषकर संवेदनशील समूहों के लिए खामियों को दूर करने की जरूरत है। प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और सही इस्तेमाल के साथ ही पर्यावरण अनुकूल प्रक्रियाओं को अपनाकर पर्यावरण प्रदूषण को कम करना भी खासा अहम है, जिससे जंगलों की रक्षा हो और हर स्तर पर खाद्य पदार्थों की बर्बादी से बचा जा सके जो खेतों से खाने की थाली तक बेहद जरूरी है।
  • वनस्पति खाद्य पदार्थों बनाम पशु खाद्यों पर ज्यादा जोर देने के अलावा खरीद/पकाने में बर्बादी के साथ ही खाद्य पदार्थों के उचित भंडारण और उनके उचित इस्तेमाल से इससे बचा जा सकता है।
यूनाइटेड नेशंस सस्टेनेबिल डेवलपमेंट समिट-2015 में वैश्विक नेताओं को ‘कचरे’ (सब्जियों के कचरे, खराब करार दिए गए सेब/नाशपाती और खराब ग्रेड की सब्जियां) से बने व्यंजन परोसे गए। यह अनचाही/खराब खाद्य पदार्थों का अनुकरणीय इस्तेमाल है, जो वैश्विक स्तर पर खाद्य पदार्थों की बर्बादी और उसके हानिकारक प्रभावों को रोकने के लिहाज से अहम है; अन्यथा यह खाना बर्बाद हो जाएगा, सड़ जाएगा और मीथेन गैस निकलेगी, जो एक ग्रीनहाउस गैस है।
‘जलवायु-स्मार्ट खाद्य प्रणाली’ में निवेश की जरूरत है, जो खाद्य सुरक्षा पर जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए जरूरी है। ज्वार-जो सूखा प्रतिरोधी फसल है, जिसके लिए कुछ बाहरी इनपुट की जरूरत होती है, इसलिए यह मुश्किल हालात में भी बढ़ सकती है। यही वजह है कि इसे ‘भविष्य की फसल’ कहा जाता है। यह पोषक अनाज कम समय (65 दिनों) में पैदा होता है और इसका सही से भंडारण किया जाए तो इसे दो साल और इससे ज्यादा समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। धान (धान के खेतों में ज्यादा पानी भरा होने के कारण ज्यादा ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन होता है) की तुलना में ज्वार CO2 के उत्सर्जन को कम रखकर जलवायु परिवर्तन के असर को कम रखने में मददगार होती है, जबकि गेहूं उत्पादन (गर्मी के प्रति संवेदनशील फसल) विपरीत प्रभावों के लिए जिम्मेदार है। अनुकूलन की व्यापक क्षमता के कारण ज्वार नमी, तापमान और बंजर भूमि सहित तमाम विभिन्नताओं का सामना कर सकती है। इसके अलावा ज्वार का करोड़ों लोगों विशेषकर छोटे/सीमांत किसानों और वर्षा की कमी वाले/दूरदराज के आदिवासी इलाकों के लोगों को खाद्य और आजीविका उपलब्ध कराने से आर्थिक योगदान काफी ज्यादा है।
2016 के विश्व खाद्य दिवस का मुख्य विषय रखा गया है, ‘जलवायु बदल रही है। खाद्य और कृषि को भी बदलना चाहिए।’ भूख की चुनौतियों के संबंध में लोगों को जागरूक बनाने और भूख के खिलाफ लड़ाई के लिए जरूरी कदम उठाने के वास्ते प्रोत्साहित करने के लिए 1979 से ही 16 अक्टूबर को इसका आयोजन किया जा रहा है। 2030 तक ‘शून्य भूख’ के स्तर को हासिल करने का वैश्विक लक्ष्य है, जिसे जलवायु परिवर्तन-खाद्य सुरक्षा का हल निकाले बिना हासिल नहीं किया जा सकता।
पोषण और कार्ययोजना पर रोम घोषणा पत्र (नवंबर, 2014) में खाद्य/पोषण सुरक्षा विशेषकर खाद्य उत्पादन की मात्रा, गुणवत्ता और विभिन्नता पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने; सुझाई गई नीतियों/कार्यक्रमों को लागू करने और संकट वाले क्षेत्रों में खाद्य आपूर्ति संस्थानों को मजबूत बनाने की जरूरत पर जोर दिया गया।
निष्कर्ष
    इस प्रकार जलवायु परिवर्तन में कमी लाना एक वैश्विक मुद्दा है; आजीविक/खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उचित अनुकूलन की रणनीतियों को लागू करना जरूरी है। भारत को अपनी बढ़ती आबादी के लिए खाद्य/गैर खाद्य जरूरतों को पूरा करने के वास्ते अपने पर्यावरण को बचाए रखने की जरूरत है। इसमें मृदा संरक्षण पर जोर देने, प्राकृतिक संसाधनों का सही इस्तेमाल की जरूरत है, जिसमें बारिश के पानी से सिंचाई भी शामिल है। खाद्य/पोषण सुरक्षा के लिए लोगों में फसल उत्पादन पर जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभावों के प्रति जागरूकता फैलाना सबसे अहम समाधान है।

worldwide-fund-for-nature

मुख्यालय:
– स्विट्जरलैंड में।
गठन
प्रकृति संरक्षण हेतु विश्वव्यापी कोष (Worldwide Fund for Nature-WWF) का गठन वर्ष 1961 में हुआ तथा उसी वर्ष इसका पंजीकरण एक परोपकारी (Charity) संस्था के रूप में हुआ।
यह पर्यावरण के संरक्षण, अनुसंधान एवं रख-रखाव संबंधी मामलों पर कार्य करता है। पूर्व में इसका नाम विश्व वन्यजीव कोष (World Wildlife fund) था।
उद्देश्य
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार हैं-
  • आनुवंशिक जीवों और पारिस्थितिक विभिन्नताओं का संरक्षण करना।
  • यह सुनिश्चित करना कि नवीकरण योग्य प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग पृथ्वी के सभी जीवों के वर्तमान और भावी हितों के अनुरूप हो रहा है।
  • प्रदूषण, संसाधनों और उर्जा के अपव्ययीय दोहन और खपत को न्यूनतम स्तर पर लाना।
  • हमारे ग्रह के प्राकृतिक पर्यावरण के बढ़ते अवक्रमण को रोकना तथा अंततोगत्वा इस प्रक्रिया को पलट देना।
  • एक ऐसे भविष्य के निर्माण में सहायता करना, जिसमें मानव प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करके रहता है।
कार्यक्रम
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ विश्व का सबसे बड़ा और अनुभवी स्वतंत्र पर्यावरण संरक्षण संगठन है। राष्ट्रीय संगठनों और कार्यक्रम कार्यालयों के वैश्विक नेटवर्क के साथ इसके 5 मिलियन से अधिक समर्थक हैं। राष्ट्रीय संगठन पर्यावरण कार्यक्रमों को संचालित करते हैं तथा डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के अंतर्राष्ट्रीय संरक्षण कार्यक्रम को वित्तीय सहायता तथा तकनीकी सुविज्ञता प्रदान करते हैं। कार्यक्रम कार्यालय डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के क्षेत्रीय कार्यों को प्रभावित करते हैं तथा राष्ट्रीय एवं स्थानीय सरकारों को परामर्श देते हैं ताकि भावी पीढ़ी प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करके रह सके।
  • इसका अधिकतर काम तीन बायोम का संरक्षण करना है जो विश्व के सर्वाधिक विविधता संपन्न क्षेत्र है: वनताजा जल पारिस्थितिकी तंत्र, और महासागर एवं तट। अन्य मामलों में, यह संकटापन्न प्रजातियों, प्रदूषण एवं जलवायु परिवर्तन पर भी चिंतित है।
  • डब्ल्यूडब्ल्यूएफ, जूलोजिकल सोसायटी ऑफ लंदन के साथ मिलकर लिविंग प्लेनेट इंडेक्स का प्रकाशन करता है।
  • अपनी पारितंत्रीय पदचिन्हों के आकलनों के साथ, इंडेक्स का इस्तेमाल द्विवार्षिक लिविंग प्लेनेट प्रतिवेदन को तैयार करने में किया जाता है जो मानवीय गतिविधियों के विश्व पर पड़ने वाले प्रभाव का अवलोकन प्रस्तुत करता है।
  • वर्ष 2008 में, ग्लोबल प्रोग्राम फ्रेमवर्क (जीपीएफ) के माध्यम से, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ अब अपने प्रयासों को 13 वैश्विक पहलों- अमेजन, आर्कटिक, चीन, जलवायु एवं ऊर्जा, तटीय पूर्वी अफ्रीका, प्रवाल त्रिभुज, वन और जलवायु, अफ्रीका का हरित प्रदेश, बोर्नियो, हिमालय, बाज़ार रूपांतरण, स्मार्ट मत्स्ययन और टाइगर-पर केंद्रित कर रहा है।

    green-peace

    मुख्यालय:
    एम्सटर्डम, नीदरलैंड।
    उद्भव एवं विकास
    • ग्रीनपीस 1971 में कनाडा में स्थापित एक अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संगठन है।
    • यह उन सरकारी और औद्योगिक नीतियों को प्रकाश में लाने तथा परिवर्तित करने के लिये कार्यरत है, जो पर्यावरण और प्रकृति के लिये हानिकारक होते हैं।
    • यह व्हेल के शिकार, नाभिकीय अस्त्रों के प्रसार, समुद्रतटीय तेल खुदाई, रेडियोधर्मी अवशेषों के समुद्र में जमाव, वन्य जीवों के शिकार, प्रदुषण और प्राकृतिक निवास (habitat) के क्षय का विरोध करता है।
    उद्देश्य
    • ग्रीनपीस का उद्देश्य पृथ्वी की प्रकृति को इसकी विविधता के साथ उपयोग करना है।
    • यह ऐसी सरकारी और औद्योगिक नीतियों की सामने रखता है या परिवर्तित कराता है जो पर्यावरण एवं प्राकृतिक संसार के लिए खतरा उत्पन्न करती है।
    • यह व्हेल मारने, नाभिकीय हथियारों के प्रसार, अपतटीय तेल अपकर्षण, महासागर में रेडियो सक्रिय अपशिष्ट निपटान और आखेट, प्रदूषण और अधिवास नष्ट होने से वन्य जीव को होने वाले खतरों का विरोध करता है।
    संरचना
    • ग्रीनपीस एम्सटर्डम, नीदरलैंड और विभिन्न देशों में प्रादेशिक कार्यालयों का ग्रीनपीस इंटरनेशनल के नाम से संचालन करता है।
    • क्षेत्रीय कार्यालय ग्रीनपीस इंटरनेशनल की निगरानी में व्यापक तौर पर स्वायत्त रूप से कार्य करते हैं।
    • ग्रीनपीस के कार्यकारी निदेशक का चुनाव ग्रीनपीस इंटरनेशनल के बोर्ड के सदस्यों द्वारा किया जाता है।
    • प्रत्येक क्षेत्रीय कार्यालय क्षेत्रीय कार्यकारी निदेशक द्वारा चलाया जाता है जिसका चुनाव क्षेत्रीय बोर्ड के निदेशकों के द्वारा किया जाता है। क्षेत्रीय बोर्ड ग्रीनपीस इंटरनेश्नल के लिए वार्षिक जनरल मीटिंग हेतु एक प्रतिनिधि की भी नियुक्ति करते हैं, जहाँ प्रतिनिधि ग्रीनपीस इंटरनेशनल के निदेशक मण्डल का चयन करते या हटाते हैं।
    गतिविधियां
    • ग्रीनपीस के आरम्भिक अभियानों के उद्देश्य थे- सील मछलियों और व्हेलों की रक्षा करना; न्युफाउंडलैंड के तट पर सील के बच्चों (baby harp) को मारने का विरोध करना, तथा; उच्च-समुद्र प्रवाही जालों (high-sea drift nets) को समाप्त करना।
    • बाद में संगठन ने परमाणु अस्त्र परीक्षणों का विरोध करना शुरू कर दिया।
    • हाल में, विषैले पदार्थों, विशेषकर स्थायी कार्बनिक प्रदूषक (पीओपी) के उत्पादन पर रोक ग्रीनपीस का एक मुख्य क्षेत्र बन गया है। स्थायी कार्बनिक प्रदूषकों के जमा होने के बाद वे पर्यावरण में कई वर्षों तक सक्रिय रहते हैं। ग्रीनपीस ने इनके उत्पादन पर रोक लगाने की मांग की है क्योंकि इनके अनावरण (exposure) की कोई सुरक्षित सीमा नहीं है। ग्रीनपीस ने डायोक्सीन (dioxins) नामक रासायनिक यौगिकों को भी अपना लक्ष्य बनाया है, क्योंकि यह डायोक्सीन की एक विषैले पदार्थ के रूप में देखता है।
    • ग्रीनपीस के सदस्य प्रत्यक्ष और अहिंसक विरोध का मार्ग अपनाते हैं। पर्यावरण की दृष्टि से हानिकारक गतिविधियों वाले क्षेत्रों का भ्रमण करना तथा इन गतिविधियों को रोकना ग्रीनपीस के सदस्यों के कार्यों में सम्मिलित है।
    • ग्रीनपीस नाभिकीय शक्ति को पारस्परिक तौर पर बड़ी समस्याओं वाले सूक्ष्म उद्योग के तौर पर देखता है, जैसे यूरेनियम खदान से पर्यावरणीय हानि एवं जोखिम, नाभिकीय आयुध अप्रसार, और नाभिकीय अपशिष्ट से संबंद्ध अनुत्तरित प्रश्न।
    • ग्रीनपीस का लक्ष्य प्राथमिक वनों का वनकटान एवं हानि से संरक्षण करके वर्ष 2020 तक वनकटान को शून्य करना है।
    • ग्रीनपीस ने यूनीलिवर, नाइक, केएफसी, किटकेट और मैकडोनाल्ड जैसे कई निगमों को उष्णकटिबंधी वर्षा वनों के कटान के लिए दोषी ठहराया है।
    • ग्रीनपीस ने अन्य पर्यावरणीय एनजीओ के साथ मिलकर विगत् दस वर्षों के अभियान द्वारा यूरोपीय संघ पर अवैध लकड़ी के आयात को प्रतिबंधित करने पर दबाव डाला है। जिसके परिणामस्वरूप यूरोपीय संघ ने जुलाई 2010 से अवैध लकड़ी के आयात को प्रतिबंधित कर दिया।
    • वर्षा वनों से संबंद्ध ग्रीन पीस का दूसरा अभियान पाम ऑयल को हतोत्साहित करना है।
    • ग्रीन पीस ने व्हेल के शिकार के विरुद्ध भी कई कार्य किए हैं। गोल्डन राइस के नियोजित उपयोग का भी विरोध किया है, जो ओरिज सटीवा राइस की एक किस्म है और जिसका उत्पादन बायोसिथेसाइज ऑफ़ बीटा-केरोटिन की जेनेटिक इंजीनियरिंग द्वारा होता है।
    • जुलाई 2011 में, ग्रीनपीस ने अपनी डर्टी लॉन्ड्री नामक रिपोर्ट जारी की जिसमें विश्व के नामी फैशन और स्पोर्ट्स वियर कंपनियों पर आरोप लगाया गया था कि वे चीन की नदियों में भारी मात्रा में विषाक्त अपशिष्ट मुक्त कर रहे हैं।
    • वर्ष 2013 में ग्रीनपीस ने डीटॉक्स फैशन नामक अभियान छेड़ा, जिसने नदियों में उनके कपड़ों के उत्पादन के परिणामस्वरूप प्रवाहित किए जाने वाले विषाक्त रसायनों को रोकने के लिए कुछ नामी फैशन ब्रांड्स को इसमें शामिल किया।
    • आर्कटिक-पर्यावरणीय प्रोटोकॉल को प्राप्त करने के लिए 2012 और 2013 में सेव द आर्कटिक नामक सफल अभियान ग्रीनपीस द्वारा शुरू किए गए।

    united-nations-environment-programme

    स्थापना , मुख्यालय एवं उद्देश्य
      इस कार्यक्रम की स्थापना 1972 में मानव पर्यावरण पर स्टॉकहोम में आयोजित संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के उप-परिणाम के रूप में हुई थी। इस संगठन का उद्देश्य मानव पर्यावरण को प्रभावित करने वाले सभी मामलों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ाना तथा पर्यावरण सम्बन्धी जानकारी का संग्रहण, मूल्यांकन एवं पारस्परिक आदान-प्रदान करना है। इसका मुख्यालय नैरोबी ( केन्या) में है।
    यूनेप के कार्य
    • यूनेप पर्यावरण सम्बन्धी समस्याओं के तकनीकी एवं सामान्य निदान हेतु एक उत्प्रेरक के रूप में कार्य करता है।
    • इसके कार्यक्रमों के अंतर्गत 1975 में स्थापित भूमंडलीय पर्यावरणीय निगरानी प्रणाली (जीईएमएस) शामिल है, जिसके द्वारा केंद्रों के एक तंत्र से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर विश्व के जलवायु परिवर्तनों, विश्व की पारिस्थितिक स्थिति, जल प्रदूषण तथा उष्णकटिबंधीय वनों से जुड़ी सूचनाएं उपलब्ध करायी जाती हैं।
    • 1985 में स्थापित भूमंडलीय संसाधन सूचना डाटाबेस (जीआरआईडी) द्वारा उपलब्ध आंकड़ों की उपयोगी सूचनाओं में बदला जाता है। इन्फोटेरा पर्यावरणीय सूचनाओं एवं विशेषज्ञता हेतु एक कम्प्यूटरीकृत संदर्भात्मक सेवा है। संभावी विषैले रसायनों को अंतरराष्ट्रीय
    • पंजिका, (आईआरपीटीसी) राष्ट्रीय संवाददाताओं के एक नेटवर्क के माध्यम से 100 देशों में कार्य करती है तथा पर्यावरण व स्वास्थ्य के लिए खतरनाक सिद्ध होने वाले रसायनों पर सूचना उपलब्ध कराती है।
    • इसके आलावा कई सलाहकारी सेवाएं तथा समाशोधन द्वारा सरकारी निजी समूहों, अंतरसरकारी तथा गैर-सरकारी संगठनों से अतिरिक्त संसाधन जुटाये जाते हैं। यूनेप द्वारा अत्यावश्यक पर्यावरणीय सहायता के लिए संयुक्त राष्ट्र केंद्र (जेनेवा) तथा अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणीय तकनीक केंद्र (ओसाका) की स्थापना की गयी है। यूनेप अन्य संयुक्त राष्ट्र निकायों के साथ सहयोग करते हुए सैकड़ों परियोजनाओं पर कार्य कर चुका है।
    यूनेप द्वारा किए गए पहल
    • पर्यावरण सुरक्षा हेतु अंतरराष्ट्रीय नियमों व आचारों के अंगीकरण में यूनेप की भूमिका प्रेरणादायी रही है। 1985 में ओजोन परत की सुरक्षा हेतु एक संधि को विएना सम्मेलन में स्वीकार किया गया। इस संधि के परिवर्ती संशोधनों के अनुसार भागीदार राष्ट्रों ने क्लोरोफ्लोरोकार्बन के उत्पादन में चरणबद्ध कटौती करने का समझौता अंगीकार किया।
    • 1989 में खतरनाक कचरे के पारदेशीय संचलन तथा निपटान के नियंत्रण हेतु की गयी बेसल संधि 1992 से लागू हुई। यह संधि विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों में किये जाने वाले कचरे के जमाव को रोकने का प्रयास करती है।
    • यूनेप द्वारा 1992 में रियो डी जेनरो सम्मेलन (पृथ्वी सम्मेलन) के आयोजन में व्यापक मदद उपलब्ध कराई गयी। इस सम्मेलन में संवहनीय भूमंडलीय विकास के लिए एक व्यापक कार्ययोजना (एजेंडा 21) को स्वीकार किया गया। पृथ्वी सम्मेलन के आग्रह पर महासभा ने एक संवहनीय विकास आयोग की स्थापना की जो पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं से जूझने वाली गतिविधियों पर निगरानी रखता है।
    • इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण वित्तीय कार्यतंत्र भूमंडलीय पर्यावरण सुविधा (जीईएफ) है, जो यूनेप, यूएनडीपी एवं विश्व बैंक के संयुक्त प्रबंधन में कार्य करता है।
    • यूनेप के प्रायोजकत्व में गंभीर रूप से सूखाग्रस्त देशों में मरुस्थलीकरण से निपटने हेतु संयुक्त राष्ट्र संधि (1994) को अंगीकार किया गया। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र ढांचागत समझौता भी 1994 से प्रभावी हुआ। यूनेप द्वारा संकटापन्न जंतुओं व पादपों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर की गयी 1973 की संधि को भी प्रशासित किया जाता है। 1993 में जैव-विविधता संधि लागू हुई।
    • यूनेप अधिवासन क्षेत्रों में पर्यावरण मानदंडों की विकृति को रोकने के लिए यूएनसीएचएस के साथ भी सहयोग करता है।
    यूनेप की प्राथमिकता सूची
    • वर्तमान में जलवायु परिवर्तन, स्वच्छ जल संसाधन, निर्वनीकरण, मरुस्थलीकरण, वन्य जीव संरक्षण, विषैले रसायनों व खतरनाक कचरे का सुरक्षित निपटान, सागरीय व तटीय क्षेत्रों का परिरक्षण, मानव स्वास्थ्य पर पर्यावरण के क्षरण का प्रभाव तथा जैव-प्रौद्योगिकी इत्यादि यूनेप की प्राथमिकता सूची में सबसे आगे हैं।
    • प्राकृतिक संसाधनों के कुप्रबंधन से निबटने हेतु तैयार किये गये सार्वजानिक शिक्षा कार्यक्रमों तथा पर्यावरण के प्रति संवेदी विकास योजनाओं को बढ़ावा देने वाले प्रयासों को यूनेप द्वारा मजबूत समर्थन दिया जाता है।
    • यूनेप स्टेट ऑफ दि एनवायरनमेंट रिपोट्स तथा ग्लोबल एनवायरनमेंट आउटलुक का प्रकाशन करता है।

    cpcb(केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड)

    गठन तथा उद्देश्य
    • केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का गठन एक सांविधिक संगठन के रूप में जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के अंतर्गत सितंबर, 1974 में किया गया था। इसके पश्चात् केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 के अंतर्गत शक्तियां व कार्य सौंपे गये।
    • यह क्षेत्र निर्माण के रूप में कार्य करता है तथा पर्यावरण (सुरक्षा) अधिनियम, 1986 के प्रावधानों के अंतर्गत पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को तकनीकी सेवाएं भी उपलब्ध करता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रमुख कार्य जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 तथा वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 में व्यक्त किये गये हैं।
    • जल प्रदूषण के निवारण एवं नियंत्रण द्वारा राज्यों के विभिन्न क्षेत्रों में कुओं और सरिताओं की स्वच्छता को सुधारना तथा देश में वायु प्रदूषण के निराकरण अथवा नियंत्रण, निवारण के लिए वायु गुणवत्ता में सुधार लाना।
    • वायु गुणवत्ता प्रबोधन वायु गुणवत्ता प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण अंग है। राष्ट्रीय वायुप्रबोधनकार्यक्रम (रा.व.प्र.का.) की स्थापना वर्तमान वायु गुणवत्ता की स्थिति और प्रवृत्ति को सुनिश्चित करने तथा उद्योगों और अन्य स्रोतों के प्रदूषण को नियमित कर नियंत्रित करने तथा वायु गुणवत्ता मानकों के अनुरूप रखने के उद्देश्य से की गई है। यह औद्योगिक स्थापना तथा शहरों की योजना तैयार करने के लिए अपेक्षित वायु गुणवत्ता के आंकड़ों की पृष्ठभूमि भी उपलब्ध कराता है।
    • इसके आलावा केन्द्रीय बोर्ड का नई दिल्ली स्थित एक स्वचालित प्रबोधन केंद्र भी है। इस केंद्र पर श्वसन निलम्बित व्यक्ति कण, कार्बन मोनो ऑक्साइड, ओजोन, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड तथा निलम्बित विविक्त कण भी नियमित रूप से प्रबोधित किये जा रहे हैं।
    संगठनात्मक संरचना
    • बोर्ड में एक पूर्णकालिक अध्यक्ष होता है, जिसे पर्यावरणीय संरक्षण से सम्बद्ध मामलों में विशेष ज्ञान या अनुभव हो या ऐसा व्यक्ति जिसे उपरिलिखित मामलों के साथ संस्था के प्रशासनिक कार्यों का ज्ञान या अनुभव हो, जिसे केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है।
    • पांच से अनाधिक सदस्य केंद्र सरकार द्वारा, उसका प्रतिनिधित्व करने वाले, नामित किए जाते हैं।
    • केंद्र सरकार द्वारा राज्य बोडों में से पांच से अनाधिक सदस्य नामित किए जाते हैं।
    • केंद्र सरकार द्वारा कृषि, मत्स्य या उद्योग या व्यापार या अन्य हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले तीन से अनाधिक गैर-सरकारी सदस्यों को नामित किया जाता है।
    • केंद्र सरकार के स्वामित्व, नियंत्रण एवं प्रबंधन वाले निगमों एवं कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाले दो व्यक्तियों को केंद्र सरकार द्वारा नामित किया जाता है।
    • केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त एक पूर्णकालिक सदस्य-सचिव जिसे प्रदूषण नियंत्रण के वैज्ञानिक, अभियांत्रिकी या प्रबंधन पहलुओं की योग्यता, ज्ञान एवं अनुभव हो।
    सीपीसीबी के दायित्व एवं कार्य
    • भारत सरकार को जल एवं वायु प्रदूषण के निवारण एवं नियंत्रण तथा वायु गुणवत्ता में सुधार से संबंधित किसी भी विषय में परामर्श देना।
    • जल तथा वायुप्रदूषण की रोकथाम अथवा निवारण एवं नियंत्रण के लिए एक राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम की योजना तैयार करतथा उसे निष्पादित कराना।
    • राज्य बोर्डों की गतिविधियों का समन्वयन करना तथा उनके बीच उत्पन्न विवादों को सुलझाना।
    • राज्य बोर्डों की तकनीकी सहायता व मार्गदर्शन उपलब्ध कराना, वायुप्रदूषण से संबंधित समस्याओं तथा उसके निवारण, नियंत्रण अथवा उपशमन के लिए अनुसंधान और उसके उत्तरदायी कारणों की खोज करना।
    • जल तथा वायुप्रदूषण के निवारण तथा नियंत्रण अथवा उपशमन के कार्यक्रम में संलग्न व्यक्तियों के लिए प्रशिक्षण आयोजित करना तथा योजनाएं तैयार करना।
    • जल तथा वायु प्रदूषण की रोकथाम अथवा नियंत्रण, निवारण पर एक विस्तृत जन-जागरूकता कार्यक्रम, मास मीडिया के माध्यम से आयोजित करना।
    • जल तथा वायु प्रदूषण और उसके प्रभावी निवारण, नियंत्रण अथवा रोकथाम के लिए किये गये उपायों के संबंध में तकनीकी तथा सम्खिकीय आंकड़ों को संग्रहीत, संकलित कर प्रकाशित करना।
    • स्टेक गैस क्लीनिंग डिवाइसिस, स्टैक्स और डक्टस सहित सहित मल-जल तथा व्यावसायिक बहिस्रावों के विसर्जन तथा शोधन के संबंध में नियमावली, आचार संहिता और दिशा-निर्देश तैयार करना।
    • जल तथा वायु प्रदूषण तथा उनके निवारण तथा नियंत्रण से संबंधित मामलों में सूचना का प्रसार करना।
    • संबंधित राज्य सरकारों के परामर्श से नदियों अथवा कुओं के लिए मानकों को निर्धारित करना तथा वायुगुणवत्ता के लिए मानक तैयार करना, निर्धारित करना, संशोधित करना अथवा रद्द करना।
    • भारत सरकार द्वारा निर्धारित किये गये अन्य कार्य निष्पादित करना।
    संघ शासित प्रदेशों के लिए राज्य बोडों के रूप में केंद्रीय बोर्ड के कार्य
    • किसी परिसर की उपयुक्तता अथवा किसी उद्योग की अवस्थिति जिससे किसी नदी अथवा कुएं प्रदूषित हो रहे हैं, अथवा उनसे वायु प्रदूषण की संभावना हो, के विषय में संघ शासित प्रदेश की सरकारों की सलाह देना।
    • सीवेज के शोधन तथा व्यावसायिक बहिस्रावों तथा ऑटोमोबाइल्स के उत्सर्जनों, औद्योगिक संयंत्र तथा अन्य किसी प्रदूषणकारी स्रोतों के लिए मानकों का निर्धारण करना।
    • सीवेज और व्यावसायिक बहिस्रावों का भूमि पर विसर्जन।
    • सीवेज और व्यावसायिक बहिस्राव तथा वायु प्रदूषण नियंत्रण उपस्करों हेतु विश्वसनीय और किफायती विधियों का उपयुक्त विकास वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम 1981 के अंतर्गत अधिसूचित क्षेत्रों अथवा केंद्र शासित प्रदेशों के क्षेत्रों में वायु प्रदूषण नियंत्रण क्षेत्र के रूप में अथवा किसी क्षेत्र का पता लगाना।
    • परिवेशी जल तथा वायु की गुणवत्ता का मूल्यांकन करना, तथा अपशिष्ट जल शोधन स्थापनाओं, वायु प्रदुषण नियंत्रण उपकरणों, औद्योगिक संयंत्रों अथवा विनिर्माण प्रक्रियाओं का निरीक्षण करना तथा जल तथा वायु प्रदूषण की रोकथाम तथा निवारण व नियंत्रण के लिए उठाये गये कदमों तथा उनकी निष्पादन क्षमता का मूल्यांकन करना।
    • भारत सरकार की निर्धारित नीति के अनुसार केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974, जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) उपकर अधिनियम, 1977 तथा वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 के अंतर्गत संघ शासित प्रदेशों के विषय में अपनी शक्तियां तथा कार्य संबंधित स्थानीय प्रशासनों को प्रत्यायोजित कर दी हैं। केंद्रीय बोर्ड अपने प्रतिपक्षों राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोडों के साथ पर्यावरणीय प्रदूषण के नियंत्रण तथा निवारण से सम्बंधित विधानों के कार्यान्वयन के लिए उत्तरदायी है।

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    प्रस्तावना
    • पिछले तीन वर्षों के दौरान नवीकरणीय और परमाणु ऊर्जा कार्यक्रमों में व्यापक स्तर पर हुई वृद्धि भारत के ऊर्जा मिश्रण में स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को प्राथमिकता देने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
    • भारत ने पहले ही नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है। विशेषरूप से सौर ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की तरक्की ने देश को दुनिया के ऊर्जा नक्शे पर विशेष पहचान दिलाई है। वर्तमान सरकार के तीन वर्ष पूरे हो चुके हैं, ऐसे में हाल ही में भारत की ऊर्जा क्षमता में परमाणु ऊर्जा के रूप में 7 गीगा वॉट (7000 मेगा वॉट) ऊर्जा क्षमता को शामिल किए जाने का निर्णय, जोकि एक ही बार में भारत के घरेलू परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम कि दिशा में सबसे बड़ी मंज़ूरी, एक स्थायी रूप से कम कार्बन विकास रणनीति की दिशा में भारत की गंभीरता और प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
    • भारत की वर्तमान परमाणु ऊर्जा क्षमता 6.7 गीगा वॉट (अथवा 6780 मेगा वॉट) है और 700 मेगावॉट प्रति रिएक्टर की क्षमता वाले 10 नए परमाणु रिएक्टरों को मंज़ूरी भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को व्यापक स्तर पर और मज़बूत करेगा। 6.7 गीगा वॉट (6700 मेगा वॉट) की अन्य परमाणु ऊर्जा परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं और 2021-22 तक इनके परिचालन में आने की उम्मीद है।
    नवीकरणीय ऊर्जा में भारत की उपलब्धियां
    • वर्ष 2014 में भारत में सौर ऊर्जा क्षमता केवल 2.65 गीगा वॉट (अथवा 2,650 मेगा वॉट) थी। तीन वर्ष के भीतर ही भारत की सौर ऊर्जा क्षमता अभूतपूर्व तरीके से 4.5 गुणा बढ़कर 12.2 गीगा वॉट (अथवा 12,200 मेगा वॉट) पर पहुंच गई है।
    • यहां एक अन्य महत्वपूर्ण बात, जिसका जिक्र किया जाना महत्वपूर्ण है, वह है सौर ऊर्जा की दरें। वर्ष 2014 में सौर ऊर्जा की दर 13 रुपये प्रति यूनिट से भी अधिक थी, जोकि वर्तमान में 500 मेगावॉट की क्षमता वाले राजस्थान के भाड़ला सौर पार्क की नीलामी में ऐतिहासिक रूप से कम होकर 2.44 रुपये प्रति यूनिट के निम्न स्तर पर पहुंच गई हैं। यह अब तक का रिकॉर्ड स्तर है।
    • यह विश्व बैंक बिजली सुगमता रैंकिंग में 2014 के 99वें स्थान से वर्तमान में 23वें स्थान पर पहुंचने वाले भारत के लिए किसी भी मानक के अनुसार सराहनीय उपलब्धि है।
    • दिलचस्प बात यह है कि सौर ऊर्जा आज भारत में ताप और कोयला आधारित ऊर्जा से भी सस्ती हो गई है, जबकि एक समय में ताप और कोयला ऊर्जा भारत के ऊर्जा क्षेत्र के आधार रहे हैं। यहां तक कि भारत की सर्वाधिक ऊर्जा सृजन कंपनी-एनटीपीसी की ऊर्जा की औसत लागत, सौर ऊर्जा के मोर्चे पर हासिल किए की गई उपलब्धियों से अधिक है।
    • यहां यह उल्लेख करना भी महत्वपूर्ण है कि वर्तमान में दुनिया के सबसे बड़े ज़मीन आधारित सौर संयंत्र और दुनिया के सबसे बड़े छत आधारित सौर संयंत्र, दोनों ही भारत में हैं।
    • पवन ऊर्जा क्षमता के मोर्चे पर, भारत ने ब्रिटेन, कनाडा और फ्रांस जैसे देशों को पीछे छोड़कर पवन ऊर्जा स्थापित क्षमता के मामले में चीन, अमरीका और जर्मनी के बाद चौथा स्थान हासिल कर लिया है। सभी को सस्ती हरित ऊर्जा सुनिश्चित कराने के लिए भारत ने वर्ष 2016-17 में रिकॉर्ड 3.46 रुपये प्रति यूनिट की दर से 5.5 गीगावॉट की अतिरिक्त उच्चतम पवन क्षमता में वृद्धि के लक्ष्य को हासिल किया है।
    • सौर, पवन, छोटी पनबिजली और जैव-शक्ति सहित भारत की नवीकरणीय क्षमता की बात करें, तो इन क्षेत्रों में पिछले तीन वर्ष में दो तिहाई की वृद्धि दर्ज की गई है, जोकि 35 गीगावॉट से बढ़कर 57 गीगावॉट पर पहुंच गई है। सरकार वर्ष 2022 तक 100 गीगावॉट सौर और 60 गीगावॉट पवन ऊर्जा के लक्ष्य को हासिल करने पर ध्यान केन्द्रित कर रही है। वर्ष 2022 तक भारत में कुल 175 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा सृजन की परिकल्पना की गई है।
    • वर्तमान सौर ऊर्जा क्षमता वर्ष 2014 में मौजूद सौर ऊर्जा क्षमता की तुलना 370 फीसदी की वृद्धि दर्शाती है। वर्ष 2014 में 2621 मेगावॉट से बढ़कर वर्तमान में मार्च 2017 तक भारत की सौर ऊर्जा क्षमता 12,277 मेगावॉट पर पहुंच गई है। इसी प्रकार, मार्च 2017 के अनुसार पवन ऊर्जा में भी 52 फीसदी की असामान्य वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2014 में 21,042 मेगावॉट पवन ऊर्जा की तुलना में मार्च 2017 में बढ़कर यह 32,304 मेगावॉट हो गई है। इसी अवधि के दौरान छोटे हाइड्रो पावर और जैव-ऊर्जा के क्षेत्र में प्रत्येक में 14% वृद्धि हुई है।
    नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में तीन प्रमुख सुधारों का सारांश निम्नानुसार किया जा सकता हैः
    • पवन क्षेत्र – यह क्षेत्र निश्चित टैरिफ व्यवस्था से प्रतिस्पर्धी बोली व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ चुका है, जिससे बिजली की लागत 20 फीसदी तक कम हो सकती है। सौर पार्कों के जरिए प्लग एंड प्लेय मॉडल का प्रयोग कर सौर ऊर्जा सस्ती हो चुकी है और इसकी दरें 75 फीसदी से भी अधिक कम हो गई हैं। और तीसरा अंतरराष्ट्रीय सौर ऊर्जा गठबंधन के गठन के जरिए दुनिया में सौर क्रांति का नेतृत्व कर भारत ने जगतगुरु का खिताब पुनः प्राप्त किया है।
    • ग्रामीण भारत में, इस कैलेंडर वर्ष के अंत (दिसंबर 2018 तक के अपने लक्ष्य को खारिज करते हुए) तक सभी गांवों में बिजली पहुंचाने का सरकार का कार्यक्रम तीव्र गति से चल रहा है। इस दिशा में सौर ऊर्जा के योगदान को अनदेखा नहीं किया जा सकता, क्योंकि अब तक ग्रामीण इलाकों में बिजली की अनुपस्थिति में छात्रों को पढ़ाई करने में सक्षम बनाने के लिए इस कार्यक्रम के तहत करीब 10 लाख सौर लैंप छात्रों को वितरित किए जा चुके हैं।
    • इसके अलावा, सौर पंप स्थापित करके किसानों को सस्ती बिजली उपलब्ध कराना, पिछले तीन वर्षों में इस सरकार की एक अन्य प्रमुख उपलब्धि है। जहां एक ओर मार्च 2014 तक करीब 11,000 सौर पंप स्थापित किए गए थे, वहीं अब इन सौर पंपों की संख्या 1.1 लाख पहुंच गई है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में वर्तमान एनडीए सरकार ने इस क्षेत्र में स्वतंत्रता के बाद से करीब 9 गुणा अधिक संख्या में सौर पंप स्थापित करने के लक्ष्य को हासिल किया है।

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    बी.टी. कॉटन : bt cotton


    बी.टी. कॉटन
    देश की पहली आनुवंशिकीय परिवर्तित जीन वाली बीटी (बैसीलसभूरिनजीएनसिस बी.टी.) कपास की तीन प्रजातियों के व्यावसायिक उपयोग की अनुमति भारत सरकार ने 26 मार्च, 2002 को प्रदान कर दी। केन्द्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय की जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्रूवल कमेटी द्वारा मंजूर की गई बीटी कपास की तीन किस्मों में मैक-12, मैक-162 और मैक-184 शामिल हैं। इन किस्मों को बहुराष्ट्रीय कम्पनी मनसांटो की भारतीय अनुषंगी कम्पनी महाराष्ट्र हाइब्रिड सीड कम्पनी (म्हाइको) ने विकसित किया है तथा उसे ही इनके बीजों के व्यावसायिक उपयोग की अनुमति तीन वर्ष को लिये कुछेक शर्तों के साथ प्रदान की गयी है। इन शतों में निम्नलिखित शामिल हैं-
    • बीज अधिनियम की शर्तों को पूरा करना।
    • बीज पर लेबल लगाकर यह सूचित करना कि यह आनुवांशिकीय परिवर्तित बीज है।
    • बीजों के वितरकों एवं बिक्री के आँकड़ों को जीएएसी को उपलब्ध कराना।
    • बोये गये क्षेत्रफल की जानकारी उपलब्ध कराना।
    • विपणन कपनी म्हाइको द्वारा पर्यावरण और किसानों की हित रक्षा के अभिप्राय से वार्षिक आधार पर जांच करना तथा लगातार तीन वर्ष तक यह रिपोर्ट देना कि इन किस्मों में किसी प्रकार की बीमारी के जीवाणु तो पैदा नहीं हो रहे हैं।
    • बीटी कपास वाले प्रत्येक खेत की बाह्य परिधि पर रिफ्यूज यानी आश्रय या शरण नामक एक ऐसी भू-पट्टी बनाई जाए, जिसमें उसी प्रजाति की गैर-बीटी कपास यानी परंपरागत कपास उगाई जाए। यह भू-पट्टी कुल बुआई क्षेत्र का कम से कम 20 प्रतिशत हो या इसमें गैर-बीटी कपास की कम से कम पांच कतारें बनाई जा सक। यह शर्त हवा के माध्यम से दूसरी फसलों या कपास की फसल में ही परागन की निगरानी से संबंधित है।
    उपरोक्त शर्तों के पालन से कई लाभ होंगे जैसे- कपास का उत्पादन व्यवस्थित और कई गुना हो सकेगा, उसे अमेरिकी बोलवॉर्म (सुंडी को रोगी वाला कीड़ा) से बचाया जा सकेगा, उत्तम और अधिक कपास से किसानों की आय बढ़ेगी तथा आस-पास के प्राकृतिक पेड़-पौधों को हानि नहीं पहुंचेगी। ज्ञातव्य है कि बीटी कपास में भूमिगत बैक्टीरिया बैसिलस थूरिनजिएनसिस का क्राई नामक जीन डाल दिया जाता है, जिससे पौधा स्वयं ही कीटनाशक प्रभाव पैदा करने लगता है और कीटनाशक दवा छिड़कने की आवश्यकता नहीं पड़ती। बीटों के कुछ विभेद पादप और पशुओं पर निर्भर करने वाले कृमियों, घोघों, प्रोटोजोआ और तिलचट्टों को भी नष्ट कर देता है। इसी विशिष्ट लक्षण के कारण यह बीटी नामक बैक्टीरिया कृषि के क्षेत्र में उपयोगी हैं। उल्लेखनीय है कि म्हाइको ने बीटी कपास की चार किस्मों के लिये आवेदन किया था लेकिन किस्म मैक-915 के संबंध में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् से परीक्षण परिणाम उपलब्ध न होने के कारण जीईएसी ने इसके व्यावसायिक उपयोग की अनुमति प्रदान नहीं की है।
    बीटी कॉटन के लाभ
    छिड़काव वाले अन्य परंपरागत संश्लेषित कीटनाशकों का उपयोग कर उगाये गये कपास की तुलना में बीटी कपास के लाभ निम्नलिखित हैं-
    • किसानों, खेतों में काम करने वाले मजदूरों और अन्य पेड़-पौधों पर कीटनाशकों का कोई बुरा असर नहीं पड़ता है।
    • कीटनाशकों के उपयोग में कमी से अधिक सुरक्षित पर्यावरण।
    • बारिश में बह जाने या कीटनाशक के खराब हो जाने से फिर से छिड़काव की आवश्यकता नहीं पड़ती।
    • कीटनाशकों के उपयोग से होने वाली दुर्घटनाओं और कानूनी विवाद कम हो जाते हैं।
    • पौधों के सभी हिस्सों में क्रिस्टल प्रोटीन बनाता है तथा यह क्रिस्टल प्रोटीन पूरे मौसम अपना असर दिखाता है।
    • लक्षित महामारी से फसल को खराब होने का खतरा कम हो जाता है।
    • बीटी कपास का उपयोग कीट नियंत्रण की अन्य विधियों को साथ किया जा सकता है।
    बीटी काटन से खतरे
    • कीड़े-मकोड़े में प्रतिरोध क्षमता उत्पन्न होने वाली बीटी कपास की उपयोगिता कम हो सकती है।
    • रासायनिक छिड़काव के जरिये अन्य कीड़े-मकोड़ों और महामारियों के नियंत्रण की आवश्यकता के कारण इन कीड़ों को प्राकृतिक रूप से नुकसान पहुंचाना हानिकारक हो सकता है।
    • बीटी कपास के उत्पादन और उपयोग की लागत बहुत अधिक हो सकती है।
    • कीटनाशकों के छिड़काव वाले कपास के खेती के आसपास बीटी कपास उगाने से कीड़े-मकोड़े बीटी कपास के खेती में आ सकते हैं जिससे उत्पादन पर असर पड़ सकता है।
    • प्रतिरोध क्षमता वाली फसल के लिये कोई नये किस्म का हानिकारक कीट विकसित हो सकता है।
    • बीटी कपास का जीन कपास के निकट संबंध वाली किसी फसल या अन्य फसल प्रजाति में पहुंच सकता है।